Wednesday, January 15, 2014


सुनो सियासत के शातिर मदारी ,,   


सुनो सियासत के शातिर मदारी ,,

एक दिन मेरी भूख तुम्हारे दरवाज़े पर जाकर 

चीखेगी ,

चिल्लाएगी ,,

शोर मचाएगी ,,,
छीनेगी तुम्हारे पालतू कुत्ते से अपने हिस्से की रोटी
और हमारी उदास आँखें तुम्हारी गाड़ियों से भी तेज़ ख्वाब बुनेंगी
उस दिन अपनी नफ़रत को स्याही बनाकर

हम लिखेंगे दास्ताने बर्बादी तुम्हारी
और फिर उस बगावत के सारे हर्फ़
तैरेंगे फ़िज़ाओं में गीत बनकर 

करेंगे हमारे हक़ की बात
बताएँगे कि जम्हूरियत तुम्हारे घरों की दीवारों पर लटका कैलेण्डर नहीं है
जिसे तुम पलट दो अपने फ़ायदे देखकर
बल्कि ये पन्ने हैं हमारी तक़दीर के
जिसे हम ही लिख सकते हैं
अपनी ताकत , हिम्मत और कोशिश की कलम से
और गर जरुरत पड़ी तो
तलवार से भी ..........// Kalyani Kabir//

Saturday, December 28, 2013

चाँद  कायर  नहीं  ,,,,,,,,



सूरज  कायर  है  ,
तभी  तो  निकालता  है  दिन  में ही  
जब  जाग  चुकी   होती  है   दुनिया  
भीड़  बिछी  होती  है  सडकों पर  
परिंदे  कर रहे  होते  हैं  चहल  - कदमी  इर्द - गिर्द 

पर  चाँद  कायर  नहीं  
बेख़ौफ़  निकलता  है  चीर  कर सीना  अँधेरे  का 
काँधे  पे लिए  हौसला  -  हिम्मत  हिमालय  सा 
चाँद  जानता  है  तन्हा  चलना  
खामोश रहना 
आहिस्ता  -  आहिस्ता  अँधेरे  को  निगलना 
तभी  तो अच्छा  लगता  है  मुझे 
जब  कहते  हो  तुम  मुझे --  ''  चाँद ''  // 

कल्याणी  कबीर   ,, 28/12/2013 //

Tuesday, November 26, 2013

मैं चलती हूँ रुक कर - गिरकर


              मैं  चलती  हूँ रुक  कर -  गिरकर .,.,.,.,.,.,.,.,


ओस  की  बूँदें  चुनकर  -  चुनकर  
मैं  चलती  हूँ रुक  कर -  गिरकर 
ये  जीवन है  नदी  की  लहरें 
बहती  रहती  कलकल - कलकल 
औरत  का दिल पीर की  कुटिया 
 फेंको   ना  तुम कंकड़  - पत्थर
देते  धोखा बनकर  अपने 
 चलना   उनसे  बचकर -  बचकर
उड़ने  के  हैं अपने  खतरे
ज़मीं   पे  रहना  डटकर -  डटकर
जिन पन्नों  में  छुपे  हैं आँसू 
उनकी बातें  मतकर -   मतक

Saturday, November 23, 2013


सर्द   हवा .....



सर्द  हवा  हैं  रातें  सर्द  ,  अब  उनसे  मुलाकातें  सर्द .
बोझिल  आँखों  को  मत  दो ,  ख्वाबों   की  सौगातें  सर्द .
कौन  सुनाये - सुनेगा  कौन , चिकनी - चुपड़ी  बातें  सर्द  .
सोने  जैसी  धूप  में  भी  बिखरी  है  जज्बातें   सर्द .
नेता  और  जनता  के बीच  घातें और  प्रतिघातें  सर्द .
जब  भी  डाला   जेब  में  हाथ , हो  गए  सारे  वादे  सर्द .
गरीबी  बसती  है  जिस  गाँव ,  आती  हैं  बारातें  सर्द .
जब  से  गया  तू  शहर  से  दूर  , पड  गई   तेरी  यादें  सर्द .

कल्याणी  कबीर  
28  दिसम्बर , 2012

 सोचती हूँ और .........

डरती हूँ जब हौसलों के चेहरे पर पड़ जायेंगी झुर्रियाँ /
मुझे रोटी के लिए तेरे दर के तरफ देखना होगा /
जब बुढापा रुलाएगा कदम दर कदम पे /
तब महफूज़ छत की जरुरत होगी मेरी बूढी नींद को /
गर दूंगी तेरे हाथों में दवाओं की कोई लिस्ट /
तू भूल तो न जाएगा उन दवाओं को खरीदना /
अभी तो चूमता है मुझको बेसबब घड़ी - घड़ी /
 कहीं तरसेंगे तो नहीं हम तेरे हाथों के छुअन को /
जाने कल के आईने में कैसे दिखेंगे हमारे रिश्ते /
फिलवक्त तो यही सच है हमारे दरम्यान मेरे बच्चे .....
'' मेरे जिस्म का टुकड़ा तू मेरी जान रहेगा ,,,,
 मेरे लिए हमेशा तू नादान रहेगा ...

Thursday, November 21, 2013


अहले सुबह निकलती हूँ घर से ,,


सर्द हवाओं को झेलते ,,

 न जाने कितनी शिकायतों को ओढ़े ,,

 मांझी के ज़ख्मों का हिसाब - 

किताब करते ,,

बज़ट को टटोलते ,,,

रोटी की तलाश में //
पर तभी तक , 
जब तक नज़र नहीं पड़ती उस ६/७ साल के बच्चे पर / 

काँधे पे लिए हुए कागज़ी बोझ का बस्ता ,,

अपने आस - पास के हालात से अनजान ,,
 लाख पढ़ना चाहो पर उसके चेहरे पर कुछ भी भाव नहीं दिखता ,, सपाट / ,, 

उछलते हुए जा रहा होता है स्कूल /

ख़ुशी से नहीं ,, 

अब एक ही पैर से कोई चल तो नहीं सकता ना...............

 उसे देखने के बाद ज़िन्दगी से कोई शिकायत नहीं होती मुझे ,
,
 हाँ पर वो बच्चा मुझे सबसे बड़ा गुरु नज़र आता है ,, 

जो इस हाल में होकर भी ज़िन्दगी की गिनती सिखाता है हमें ,,,,,,,, /

Regards to tht CHILD -

 सहेजें  अबकी  बार  अपने  गुस्से  को  

क्यों  सहेज  नहीं   पाते  हम  अपने  गुस्से  को  देर  तक   ।
बहा  क्यूँ  देते  हैं  वक्त  ढलते  ही  नारजगी  अपनी  
सियासतदानों   के  झूठे  वादों  की  बरसाती  नालियों  में  ।
जोड़ते  नहीं  हम  अपने  हाथ  जब  तक  टूटता  नहीं  कुछ  
गहरे  तक  .....
तभी  तो  खेलते  हैं  वो  सफेदपोश  मदारी  ,
बनकर  हमारी  भूख  को  शतरंज  की  मोहरें  
अपने  नापाक  मंसूबों  की  बिसात  पर   ।
चलो  ,, 
ज़िंदा  रक्खें  अबकी बार  
 नफ़रत  के कुछ   ज़हरीले  पेड़  
बोयें इस  शुष्क  सरज़मीं  पर  कुछ  बागी  शज़र  
गाते  रहें  तरन्नुम  में  इंकलाबी  गीत  
जब  तक  सुराख ना  हो  जाए  हैवानियत  के  उन  तिलिस्मी  किलों  में  
और  फिर  खिंच  लायेंगे किसी  दिन  उसी  दीवार  से  हम  
ज़म्हूरियत   में  नहाई  चांदनी  और  
सुकून  में  लिपटा  एक  सूरज  ...  .//