Tuesday, July 28, 2026

थके  -  हारे  हुए  कदमों  से  भी  चलती तो  अच्छा  था ,,,,,,,,
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न  रह  खामोश  ऐ  औरत  ,,,तू  कुछ  कहती  तो  अच्छा  था ,
वतन के  आधे  नक़शे   पे  तू  भी रहती  तो    अच्छा  था 

नहीं  उम्मीद    रख  गैरों     से     तेरे  अश्क़      पोछेंगे  , 
 तू  अपने  दर्द  का  मरहम  खुद  ही  बनती  तो  अच्छा  था 

नज़र आती  नहीं  फसलें  ज़मीं पे  अब  मुहब्बत  की , 
तू  बन  के पावनी  गंगा  ,  यहाँ  बहती  तो  अच्छा  था 

जो  देते  हैं  सजा  तुझको  तेरे  मासूम होने  की ,
उनके शातिर  गुनाहों को  नहीं  सहती  तो  अच्छा  था 

तुम्हें  बाज़ार  में बिकता  खिलौना  मानते  हैं  जो ,
ऐसे  बीमार  लोगों से  नहीं  डरती  तो  अच्छा  था 

अगर  महफूज़  रखना  है  तुम्हें  नामों -  निशां  अपना ,
थके  -  हारे  हुए  कदमों  से  भी  चलती तो  अच्छा  था ....//

    परिचय:
 * बिहार  के  मोकामा  नामक  गाँव  में  ५  जनवरी  को  जन्म ,
*  सम्प्रति   झारखण्ड  के  जमशेदपुर  शहर  में  अध्यापिका के  पद  पर  कार्यरत  ,
*  आकाशवाणी  जमशेदपुर  में  आकस्मिक उद्घोषिका ,
*  सहयोग ,  अक्षरकुम्भ, सिंहभूम  जिला  साहित्य  परिषद्  और  जनवादी  लेखक  संघ  
     जैसे  साहित्यिक  मंच  की  सदस्या  .
*स्थानीय  समाचार  पत्रों  ( हिन्दुस्तान  ,  दैनिक जागरण  ,  दैनिक  भाष्कर  , प्रभात  खबर  ,  इस्पात  मेल  )
आदि  में  रचनाएं प्रकाशित).
कैक्टस हूँ मैं शायद  ..... 



कैक्टस हूँ मैं शायद  ..... 
जी ही लेती हूँ .

साँसोँ के हर सवाल में 
हर रुत   में - हर हाल में 
अश्कों के हर गीत में ,, 
तन्हाइयों की हर ताल में 

कैक्टस हूँ मैं शायद  ..... 
जी ही लेती हूँ ,

मीठे लफ़्ज़ों के बादल बिन भी ,
नीली - बूँदों के आँचल बिन भी  .

दरकती रिश्तों की ज़मीं पर भी ,
जलती धूप के कालीन पर भी .

झुलसाती हवाओं के बीच भी ,
काम  न आती दुआओं के बीच भी  .

बदन जलाती  दोपहर को भी  ,
तन्हाइयों के ज़हर को भी ,
पी ही  लेती हूँ .

जी ही लेती हूँ ..... 
हर रुत   में - हर हाल में 
कैक्टस हूँ मैं शायद  ..... !!
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डॉ कल्याणी कबीर 


                                   सूरज  बाबा रोज़  आते है



सूरज  बाबा रोज़  आते हैं                                                
 लेकर पोटली  में  चमचमाती  धूप                                        
और  ,,,
 झिलमिलाती किरणों की  चूड़ियाँ 
पर मिलती नहीं उन्हें खिड़कियाँ ...
न आँगन ,,
न चबूतरे ,, 
न छत ,, 
न  बरामदा 
सिर्फ  दीवारें  ही  दीवारें दिखती  हैं
 घरों के  अंदर  भी  और  बाहर  भी
 गैराज  बन गए  गाड़ियों के  , जो कल थे  खेल  के  मैदान ,
 चहचहाते   थे  परिंदे जहाँ , वो  शाखें  है  सुनसान 
 उँडेले  किस पर वो दुआएँ  ईश की ,,
फैलाएँ अब  कहाँ   किरणें अशीष  की 
 लौट  जाते  हैं वो उदास रात की  पगडंडियों पर 
इंसानों की  जगह  ज़मीं पर रेंगते 
 मशीनों को  देखकर  .....//
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