Friday, September 13, 2013

ऐ कलम के कारीगरों ,,
सच पे लिखना कुछ और बात है और सच के लिए लड़ना कुछ और ,,
फर्क है सूरज को स्वयं गढ़ने में और चढ़ते सूरज को सलाम करने में ,,
हुई इस कदर रुसवा वो अपने सरज़मीं पर
कि लगाया गले मौत को भी किसी और वतन में ,,,
जी रही है आज भी वो हमारे अश्कों की चीख में
और लिपटा पडा है मादरे - हिंद अपने कफन में .../kk/
[ हमें माफ़ मत करना '' दामिनी '' ]

Friday, September 6, 2013

मेरा अस्त्तित्व ,
महज कुछ शब्दों की गठरी नहीं है .
न ही ये हो हल्ला मचाने का एक जरिया भर है .
ये है मेरी सोच का हस्ताक्षर ,,,,,मेरे होने का प्रमाण - पत्र
. मेरी जीवन राह् है ये ,,.. जो हलचल से नहीं डरती
न ही घबराती है अनवरत जगती रातों से ,
ये एक रोशनी है जिसकी छांव मॆं सांस ले रही है सृष्टि सारी ,,
मेरा वजूद मेरे गर्भ मॆं पल रहे शिशु की तरह है
जो पहचान है मेरे स्त्रीत्व की
और
जिसका जीवित रहना
मेरे जीवित रहने से भी ज्यादा जरूरी है ........//
ज़िन्दगी सौ ग्राम की हो या सात सौ ग्राम की ज़िन्दगी है । इस ज़िन्दगी में गरीब अपने पेट कों लेकर परेशान है तो अमीर अपने " पासबुक " कों सँभालने में । पर परेशान सब हैं कारण अलग हो सकता है ।

तो फिर ........ ऐ ज़िन्दगी गले लगा ले , हमने भी तेरे हर एक ग़म कों गले से लगाया है , ,,,,,,,,,, है ना /
........एक सेठ था .कहता था कि वो तन्हा है और ग़मगीन भी . एक मैना भी थी जो रहती थी सूने अँधेरे जंगल में ,, उदास थी वो भी अपनी ज़िन्दगी से . दोनों मिले साझा किया अपना दुःख , अपनी तकलीफ . एक रिश्ता बनाया नहीं तोड़ने के लिए ,, चाहत और यकीं के बल पर , बिना किसी कागजी हस्ताक्षर और हलफनामे के . फिर एक दिन अचानक सेठ तोता ले आया . बेरूख होने लगामैना से . उसे अब मैना से उसका रिश्ता तोड़ने लायक लगने लगा . सेठ शातिर था पर मैना संवेदनशील . वो सेठ के इस रवैये को बर्दाश्त नहीं कर पाई . झगड़ने लगी , बोलने लगी उलटी - पुलटी बात . बस फिर क्या था ,, बहाना मिल गया सेठ को मैना से पीछा छुडाने का , बोझ सा लगने लगा था उसे अब ये रिश्ता ,,मैना के चीख के पीछे छिपी चाहत उसे नज़र नहीं आती थी अब . निकाल फेंका उसने मैना को अपनी ज़िन्दगी से . उसे तो वैसे भी अब तोता मिल गया था अपनी शामें रंगीन करने के लिए . वो चाहता था मैना फिर चली जाए उसी अँधेरे जंगल में ,बिना सवाल खड़े किये ,किसी बेजान सामान की तरह . मैना फिर तनहा ,,चली गई जंगल ,,,जीने नहीं,,,मौत का इंतज़ार करने ...... कितनी बुद्धू थी न मैना ? क्या जरुरत थी किसी को इतना चाहने की .////
BY नाम तो याद है ना मेरा :---- Kalyani Kabir---
दुःख तो बहुत होता है जब किताबें कुछ और पढ़ाती हैं और ज़िन्दगी कुछ और ,,
उसूलों , रवायतों का '' क , ख , ग '' पढ़कर भी जब उलझ जाती हैं साँसें जज्बातों के भूगोल में ,
कदम रोते हैं जब .... रिवाजों के रास्ते और ख़्वाबों की गली जुदा नज़र आते हैं ,,
पर ,,
मुश्किल है ,, अपने भीतर रह रही उस '' मैं '' को रोकना
जो सफ़ेद बालों में चेहरा छुपाये ,, अब भी ढूँढती रहती है ,
मुस्कुराने की वज़ह .......... उनकी आँखों में //


kalyani  kabir

Saturday, May 4, 2013

ख्वाहिश नहीं थी .......


तुम्हें  पाने  की  ख्वाहिश  नहीं  थी 
कोशिश  भी  नहीं की 
पाया  भी  नहीं  तुझे 
मैं  तो  सिर्फ  डुबोना  चाहती  थी 
अपने  ज़ख्म , दर्द  , नासूर  को 
तुम्हारे  वजूद  के  समंदर  में 
इस  उम्मीद  में  कि  तुम 
नहीं  मांगोगे  इसके  एवज़  में 
मेरे वजूद  से ,,,,, अपने  नाम  कोई हिस्सा ...... /